अनुक्रमणिका

सचिव की कलम से - ओम प्रकाश शर्मा
अध्‍यक्षीय उद्बबोधन - सुश्री नीता जैन
संपादकीय - शकील अहमद सिद्धीकी
प्रधान संपादक की बात - सुशील कुमार त्रिपाठी
न्‍यायिक प्रक्रिया में अनापेक्षित विलम् के संदर्भ में उच्चतम न्यायालय के दिशा निर्देश - त्रिभुवन प्रताप चंद्रगुप्ता ‍‍‍‍ ‍
हमारे गौरव : शिव प्रसाद कापसे - राष्ट्रीय मुक्केबाज जज
‍‍AN OVERVIEW ON CONTEMPT OF COURT LAW - T.P.C.GUPTA
संदेश
मानव अधिकार और मौलिक अधिकार के मध् शरीर आत्मा का संबंध है - सुधीर तिवारी‍‍
सूचना का अधिकार - संजय शर्मा
हमारे गौरव - सौमित्र तिवारी सृष्टि तिवारी
गिरफ्तारी : संवैधानिक संरक्षण एवं अन् विधि - रामेश्वर प्रसाद प्रजापति‍‍
न्यूटन फेल होगीस : कविता - ताराचंद शर्मा
सदुपदेश - अजीत सिंह राजपूत
केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल में कार्यशाला का आयोजन - दीप्ति पौरिया
LABOUR LAW REQUIREMENT OF NEW LOOK - SAMEER KUMAR TRIPATHI
PLEA BARGAINING IN INDIA - ABIRA BHATTACHARYA
विधि सूचना क्रांति - संजीव तिवारी
अदालत में करोडो का भ्रष्टाचार - समाचार
शव्दों के संसार में : कविता - मिर्जा मशहूद बेग
एक सेवानिवृत लिपिक का साक्षात्कार
हमारी भी कुछ सुनें
विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय में लंबित प्रकरणों का अंबार - विशेष समाचार‍‍‍
सर्वोच् न्यायालय : न्याय दृष्टांत‍‍‍‍


#इस बुलेटिन में रचनाकारों द्वारा जो लेख कविता, निबंध आदि प्रकाशन हेतु उपलब्‍ध कराए गये हैं उनके प्रकाशन में उनके व्‍यक्तिगत विचार हैं जिसमें संपादक मण्‍डल का सहमत होना आवश्‍यक नहीं है तथा रचनाकार ही अपनी रचनाओं के जवाबदार हैं ।#

4 comments:

महामंत्री-तस्लीम 8 August 2008 at 15:42  

आपका यह सामुहिक प्रयास उत्तम है। यह अवश्य ही रंग लाएगा।

लोकेश 8 August 2008 at 21:52  

इस सामूहिक प्रयास के लिये बधाई व शुभकामनायें

दिनेशराय द्विवेदी 9 August 2008 at 01:02  

बधाई! लगता है अभिभाषकों में जागरूकता आ रही है। एक जिला अभिभाषक संघ का अपना ऑनलाइन अखबार देख कर प्रसन्नता की सीमा न रही। पूरा देखना पड़ेगा। कल-परसों के अवकाश में देखता हूँ।
निचली अदालतों के अभिभाषक ही वह ताकत है जो न्यायिक सुधारों का बिगुल बजा सकते हैं। न्यायपालिका की गिरती साख को थाम सकते हैं। न्यायपालिका को सक्षमं बनाने के लिए सामने आ सकते हैं। न्यायपालिका को बचाने, विस्तार देने और न्याय को जन-जन तक पहुँचाने का संघर्ष लड़ सकते हैं।
न्यायपालिका पर सरकार की अनदेखी से जनता के उपरांत सब से अधिक हानि उन्हें ही हो रही है। वे ही इस के सब से बड़े विक्टिम हैं। और उंगली जिस की कटती है वही सब से पहले सीना तान कर खड़ा होता है। गंभीरता से किए गए विचार से ही गति बनेगी। अभिभाषक यदि इस रास्ते पर उतर आए तो देश का न्यायिक मानचित्र ही नहीं राजनैतिक दशा भी बदल सकते हैं।
दुर्ग अभिभाषक संघ को इस स्तुत्य प्रयास के लिए बधाई और आभार भी।

राजेंद्र माहेश्वरी 5 September 2008 at 18:26  

दुर्ग अभिभाषक संघ को इस स्तुत्य प्रयास के लिए बधाई|


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