शब्दों के संसार में

मिऱ्जा मशहूद बेग
अधिवक्ता, दुर्ग


मैं
हर रोज १० से ५
तलाशता हूँ न्याय !
हर कोई
१० से ५ का
करता है सिर्फ हिसाब !
``प्वाइंट'' के जाल में
उलझ गया है न्याय,
तर्क-वितर्क के बीच
उग गई है फैसलों की फसल !
हर कोई,
१० से ५
आंकता है काटकर
फैसलों की फसल !
लौट जाता ह ैरिपोर्ट देकर ।।
मैं,
हर रोज १० से ५
तलाशता हूँ न्याय,
``प्वाइंट'' के चक्रव्यूह में
जैसे - तैसे प्रकरण निपटाकर
हर कोई,
पूरी करता है नौकरी ।।
न्याय,
हर रोज १० से ५
हार - जीत के बीच
निरर्थक होता देखता हूँ,
मैं !

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